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"हुज़ूर, मैं मरा नहीं, ज़िंदा हूं"

  • लेखक की तस्वीर: Jantantra Live
    Jantantra Live
  • 2 दिन पहले
  • 3 मिनट पठन

शरीर पर कफ़न और गले में माला पहन डीएम से मिलने पहुंचा बस्ती का एक शख़्स



बस्ती: स्वास्थ्य विभाग का कर्मचारी ड्यूटी करता रहा और राजस्व विभाग ने 14 साल पहले मुर्दा घोषित कर उसकी 0.770 हेक्टेयर जमीन दूसरे के नाम कर दी. यह भ्रष्टाचार का मामला बस्ती जिले का है, जो न्याय व्यवस्था और प्रशासनिक ईमानदारी को कटघरे में खड़ा कर दिया है. यह कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट जैसी लगती है, लेकिन इसके किरदार और जख्म बिल्कुल असली हैं.

बस्ती का जीवित व्यक्ति पिछले 14 वर्षों से सरकारी फाइलों में मुर्दा है, जबकि बैंक से अपनी पेंशन निकाल कर खा रहा है और शासन के सामने जीवित खड़ा होकर अपने वजूद की भीख मांग रहा है. गुरुवार को सरकारी फाइलों में मुर्दा बुजुर्ग, शरीर पर कफन और गले में माला डाल कर न्याय के लिए डीएम ऑफिस पहुंचा था, बुजुर्ग को देखकर सभी चौक गए, राहगीर भी सोच में पड़ गए कि आखिर कैसे एक जिंदा लाश मुर्दा बनकर सरकारी सिस्टम को मुंह चिढ़ा रहा है.दरअसल यह पूरा मामला लालगंज थाना अंतर्गत ग्राम बानपुर गांव का है, पीड़ित इशहाक अली पुत्र फुल्लूर संतकबीर नगर, नाथनगर सीएचसी में स्वीपर के पद पर तैनात था, रिकॉर्ड के मुताबिक, इशहाक अली 31 दिसंबर 2019 को अपनी सेवा पूरी की और विभाग ने उन्हें ससम्मान से विदाई दी, लेकिन राजस्व विभाग के जादूगरों ने इससे सात साल पहले ही इशहाक को सरकारी फाइलों में मार दिया था.

तत्कालीन राजस्व निरीक्षक ललित कुमार मिश्रा पर आरोप है कि उन्होंने पद का दुरुपयोग करते हुए 2 दिसंबर 2012 को कागजों में इशहाक अली की मौत दर्ज कर दी, मौत दर्ज होते ही उनकी पुश्तैनी कृषि भूमि गाटा संख्या 892 को गांव के ही एक महिला शाहिदुन्निशा के नाम चढ़ा दिया.इस मामले में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि साल 2012 से 2019 के बीच, जब राजस्व विभाग के अनुसार इशहाक अली स्वर्गवासी हो चुका था, उसी दौरान स्वास्थ्य विभाग उन्हें हर महीने वेतन दे रहा था. सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन के दो अंगों के बीच कोई तालमेल नहीं है? अगर कर्मचारी मर गया था, तो स्वास्थ्य विभाग 7 साल तक वेतन किसे देता रहा?

अगर कर्मचारी जीवित था तो बिना मृत्यु प्रमाण पत्र की पुष्टि किए राजस्व निरीक्षक ने वरासत कैसे कीसी दूसरे के नाम कर कर दी? इशहाक अली आज भी जीवित हैं और सरकार से नियमानुसार पेंशन प्राप्त कर रहा हैं. उसके पास पेंशन पेमेंट ऑर्डर है, बैंक का स्टेटमेंट है और जीवित होने का प्रमाण पत्र भी है, बावजूद इसके, तहसील के गलियारों में उसे 'मृत' बताकर उसकी जमीन पर भू-माफियाओं का कब्जा बरकरार है, पीड़ित का कहना है कि वह पिछले कई सालों से अधिकारियों की चौखट घिस रहा है, लेकिन भ्रष्ट तंत्र अपनी गलती सुधारने के बजाय मामले को दबाने में जुटा है.पीड़ित बुजुर्ग ने कहा साहब, मैं हर दिन खुद को जिंदा साबित करने के लिए दस्तावेज दिखाता हूं, सरकार मुझे पेंशन दे रही है ताकि मैं पेट भर सकूं, लेकिन मेरे अपनों और मेरे गांव में मुझे कागजी तौर पर मार दिया गया है, कहा मेरी जमीन मेरी पहचान है और मैं अपनी पहचान वापस लेने के लिए कई साल से अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर काट रहा हुं.यह मामला आजमगढ़ के मशहूर लाल बिहारी 'मृतक' की याद दिलाता है, जिन्होंने खुद को जिंदा साबित करने के लिए 18 साल तक कानूनी लड़ाई लड़ी थी. बस्ती का यह मामला उससे भी गंभीर है क्योंकि यहां पीड़ित एक सरकारी सेवक है. इस प्रकरण को लेकर एसडीएम शत्रुघ्न पाठक से जब बात की गई, तो उन्होंने बताया कि एक व्यक्ति उनके पास आए है, जो खुद को जीवित बता रहे है, उनका प्रकरण बेहद गंभीर है, इस मामले में जांच कर दोषी कर्मचारी के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्यवाही की जाएगी और पीड़ित बुजुर्ग को न्याय दिलाया जाएगा.

 
 
 

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