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सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना: यूपी में विकास प्राधिकरणों की सुस्ती या भ्रष्टाचार को संरक्षण?

लेखक की तस्वीर: Jantantra Live
Jantantra Live
26 अग॰
3 मिनट पठन

​रिहायशी इलाकों में अवैध व्यावसायिक गतिविधियां: अदालती चाबुक के बावजूद क्यों सो रही हैं जिम्मेदार एजेंसियां? सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश, कड़े दिशा-निर्देश और देशभर में हो रही धड़ाधड़ कार्रवाई... लेकिन उत्तर प्रदेश के विकास प्राधिकरणों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही। यह सवाल अब सिर्फ प्रशासनिक अक्षमता का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर सर्वोच्च न्यायालय की अवहेलना और भ्रष्टाचार के गहरे गठजोड़ का बन गया है।


नई दिल्ली/गाजियाबाद। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि आशियाना व्यापार का अड्डा नहीं बन सकता। 25 मार्च 2026 को लोगनाथन बनाम तमिलनाडु राज्य मामले में आया फैसला पूरे देश के लिए एक नजीर था। देश भर के नगर निगमों और विकास प्राधिकरणों को सख्त हिदायत दी गई कि आवासीय कॉलोनियों से अवैध दुकानें, शोरूम, कोचिंग सेंटर और गोदाम तुरंत हटाए जाएं। अगस्त 2026 आते-आते बेंगलुरु से लेकर भोपाल तक नगर निगमों ने सीलिंग और ध्वस्तीकरण की कार्रवाई शुरू भी कर दी। लेकिन उत्तर प्रदेश का परिदृश्य इस राष्ट्रीय मुहिम से बिल्कुल जुदा और चौंकाने वाला है।

ज़मीनी हकीकत: नियमों की धज्जियां और जारी अवैध निर्माण: ​लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) को यदि एक अपवाद मान लिया जाए, तो प्रदेश के बाकी तमाम विकास प्राधिकरणों के उपाध्यक्षों और प्रवर्तन टीमों ने जैसे सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक आदेश को रद्दी की टोकरी में डाल दिया है।कानपुर,  वाराणसी,  मेरठ,  आगरा,  नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गाजियाबाद... सूची लंबी है, और सभी जगहों पर स्थिति जस की तस बनी हुई है। ​अदालत के सख्त रुख के बावजूद उत्तर प्रदेश की आवासीय कॉलोनियों में कोई बदलाव नजर नहीं आ रहा। स्थिति सुधरने के बजाय और विकराल होती जा रही है। ​खुलेआम व्यावसायिक प्रयोग: आवासीय मकानों में रेस्टोरेंट, निजी अस्पताल, कपड़े के शोरूम और मालवाहक गोदाम धड़ल्ले से चल रहे हैं।

नए निर्माणों में खुलेआम धांधली: पुराने अवैध कब्जों की बात तो छोड़िए, वर्तमान में बन रहे नए आवासीय मकानों के बेसमेंट और स्टिल्ट पार्किंग में खुलेआम कमर्शियल प्रतिष्ठान तैयार कराए जा रहे हैं।

​सड़कों पर कब्जा और अतिक्रमण: रिहायशी इलाकों में बिना पार्किंग के चल रही इन दुकानों के कारण आम नागरिकों का पैदल चलना और गाड़ियां निकालना दूभर हो चुका है।

प्रशासनिक सुस्ती या भ्रष्टाचार का गठजोड़?: ​सवाल यह उठता है कि जब सुप्रीम कोर्ट का आदेश साफ है, तो फिर यूपी के विकास प्राधिकरणों के उपाध्यक्ष और अधिकारी कार्रवाई करने से क्यों कतरा रहे हैं? ​बिना अनुमति के चल रही इन व्यावसायिक गतिविधियों से करोड़ों रुपये का वारा-न्यारा होता है। आवासीय दरों पर संपत्ति खरीदकर उस पर व्यावसायिक मुनाफा कमाना और प्राधिकरण के अधिकारियों का इस पर आंखें मूंद लेना, सीधे तौर पर प्रशासनिक भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है। निचले स्तर के इंजीनियरों से लेकर शीर्ष अधिकारियों तक फैला यह तंत्र तभी जागता है जब कोई बड़ा हादसा हो जाता है या जनहित याचिका दाखिल होती है।

​आम जनता को चुकानी पड़ रही है भारी कीमत: ​रिहायशी इलाकों में अवैध कमर्शियल गतिविधियों का सबसे बड़ा खमियाजा उन निर्दोष नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है, जिन्होंने शांतिपूर्ण जीवन के लिए अपनी गाढ़ी कमाई से मकान खरीदे थे। दिन-रात व्यावसायिक वाहनों की आवाजाही से बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा दांव पर है। आवासीय बेसमेंटों में बिना किसी 'नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' (NOC) के चल रहे गोदाम और रेस्टोरेंट किसी बड़े अग्निकांड को दावत दे रहे हैं। बिजली, पानी और सीवरेज की लाइनें जो आवासीय आबादी के हिसाब से बनी थीं, कमर्शियल लोड के कारण पूरी तरह ध्वस्त हो रही हैं।

प्रशासनिक सुस्ती या भ्रष्टाचार का 'गठजोड़'?: अब सवाल यह उठता है कि जब सुप्रीम कोर्ट का आदेश आईने की तरह साफ है, तो फिर यूपी के विकास प्राधिकरणों के उपाध्यक्ष और अधिकारी कार्रवाई करने से क्यों कतरा रहे हैं? जवाब शायद उस अकूत काली कमाई में छिपा है, जो इन अवैध गतिविधियों से पैदा होती है।

आवासीय दरों पर संपत्ति खरीदकर उस पर व्यावसायिक मुनाफा कमाना एक बड़ा खेल है। इस खेल में प्राधिकरण के अधिकारी आंखें मूंद लेते हैं, और बदले में उनकी जेबें गर्म होती रहती हैं। यह सीधे तौर पर प्रशासनिक भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है। निचले स्तर के इंजीनियरों से लेकर शीर्ष अधिकारियों तक फैला यह तंत्र तभी जागता है जब कोई बड़ा हादसा हो जाता है, जनहित याचिका दाखिल होती है, या शासन से सख्त फटकार लगती है।

अब आगे क्या? जवाबदेही तय करने का वक्त: ​सुप्रीम कोर्ट का आदेश केवल कागजी गाइडलाइन नहीं है, बल्कि देश के कानून का हिस्सा है। उत्तर प्रदेश शासन को तुरंत हस्तक्षेप करते हुए सभी विकास प्राधिकरणों के उपाध्यक्षों की जवाबदेही तय करनी होगी। ​यदि जल्द ही अवैध रूप से चल रहे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर सीलिंग की कार्रवाई शुरू नहीं हुई और बेसमेंट में हो रहे नए कमर्शियल निर्माणों को ध्वस्त नहीं किया गया, तो यह न केवल अदालत की अवमानना होगी, बल्कि आम जनता के अधिकारों पर सीधा डाका होगा। वक्त आ गया है कि सोए हुए बुलडोजर का रुख उन भ्रष्ट अधिकारियों और अवैध कारोबारियों की तरफ मोड़ा जाए जो रिहायशी इलाकों का सुकून बेच रहे हैं।

 
 
 

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