IGRS पर झूठी आख्या लगाना और शिकायतकर्ता की गोपनीयता उजागर करना अधिकारियों को पड़ सकता है भारी


BNS के तहत अधिकारियों पर दर्ज हो सकता है आपराधिक मुकदमा, 3 साल तक की जेल का प्रावधान
राजेश यादव
--------------------
लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आम नागरिकों की शिकायतों के निस्तारण के लिए संचालित जनसुनवाई-समाधान (IGRS) पोर्टल प्रशासनिक जवाबदेही का महत्वपूर्ण माध्यम है। लेकिन यदि किसी शिकायत पर बिना उचित जांच के गलत या भ्रामक आख्या लगाकर उसे निस्तारित दिखाया जाता है या शिकायतकर्ता की पहचान, मोबाइल नंबर अथवा अन्य निजी जानकारी अनधिकृत रूप से संबंधित पक्ष को उपलब्ध कराई जाती है, तो मामला केवल विभागीय लापरवाही तक सीमित नहीं रह सकता। परिस्थितियों और अधिकारी की मंशा के आधार पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत आपराधिक कार्रवाई का प्रश्न भी उठ सकता है। विधिक विशेषज्ञों के अनुसार, जानबूझकर गलत रिपोर्ट लगाना और शिकायतकर्ता का विवरण आरोपी को देना भारतीय कानून के तहत गंभीर आपराधिक श्रेणी में आता है।
गलत रिपोर्ट और निजता के उल्लंघन पर क्या कहता है कानून?
हाल के दिनों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहाँ आईजीआरएस पर शिकायत दर्ज कराने के बाद संबंधित अधिकारियों ने बिना धरातलीय जांच के झूठी रिपोर्ट लगाकर शिकायत निस्तारित दर्शा दी। इतना ही नहीं, शिकायतकर्ता का मोबाइल नंबर और व्यक्तिगत पहचान आरोपी पक्ष को उपलब्ध करा दी गई, जिसके आधार पर दबंगों द्वारा पीड़ित पर शिकायत वापस लेने का दबाव बनाया गया और धमकियाँ दी गईं।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, नए कानून भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत इस तरह के कृत्य पर अधिकारियों के खिलाफ सीधी कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है:

सरकारी रिकॉर्ड में जानबूझकर गलत रिपोर्ट पर BNS की धारा 256
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, नए कानून भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 256 ऐसे लोक सेवक से संबंधित है जो कानून के निर्देशों का जानबूझकर उल्लंघन करते हुए गलत रिकॉर्ड या लेख तैयार करता है, ताकि किसी व्यक्ति को कानूनी दंड से बचाया जा सके या उसे नुकसान पहुंचाया जा सके। परिस्थितियों के अनुसार इस धारा के तहत तीन वर्ष तक के कारावास या जुर्माने अथवा दोनों का प्रावधान है। इसलिए यदि यह प्रमाणित हो कि किसी अधिकारी ने शिकायत की वास्तविक जांच किए बिना या तथ्यों को जानते हुए जानबूझकर ऐसी आख्या तैयार की जिससे शिकायत गलत तरीके से निस्तारित हो जाए, तो संबंधित अधिकारी की भूमिका की कानूनी जांच हो सकती है।
गलत दस्तावेज या रिपोर्ट तैयार करने पर धारा 201 का सवाल
BNS की धारा 201 (पूर्व में IPC 167) लोक सेवक द्वारा किसी व्यक्ति को क्षति पहुंचाने के इरादे से गलत दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड तैयार करने से संबंधित है। इसके तहत भी परिस्थितियों के आधार पर तीन वर्ष तक के कारावास, जुर्माने या दोनों का प्रावधान है। इसका मतलब यह है कि शिकायत निस्तारण के दौरान तैयार की गई आख्या या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड में जानबूझकर गलत तथ्य दर्ज करने का आरोप हो तो केवल विभागीय जांच ही नहीं, बल्कि आपराधिक कानून के तहत भी उसकी जांच की स्थिति बन सकती है।
आरोपी को बचाने के लिए कर्तव्य की अवहेलना पर कार्रवाई
BNS की धारा 255 (पूर्व में IPC 217) ऐसे लोक सेवक से संबंधित है जो जानबूझकर अपने कानूनी कर्तव्य का उल्लंघन करता है और उसका उद्देश्य किसी व्यक्ति को कानूनी दंड से बचाना होता है। इस अपराध के लिए दो वर्ष तक के कारावास, जुर्माने या दोनों का प्रावधान है। इसलिए यदि किसी शिकायत में अधिकारी की भूमिका केवल लापरवाही की न होकर किसी आरोपी को बचाने के उद्देश्य से कर्तव्य की जानबूझकर अनदेखी करने की पाई जाती है, तो संबंधित प्रावधानों के तहत कार्रवाई का प्रश्न उठ सकता है।
शिकायतकर्ता की पहचान आरोपी तक पहुंचाना भी गंभीर विषय
IGRS शिकायत में शिकायतकर्ता द्वारा दिए गए मोबाइल नंबर, पता, पहचान और अन्य व्यक्तिगत विवरण को आवश्यकता से अधिक या अनधिकृत तरीके से साझा किया जाना शिकायतकर्ता की सुरक्षा और निजता से जुड़ा गंभीर विषय बन सकता है।
यदि किसी अधिकारी ने जानबूझकर शिकायतकर्ता की जानकारी आरोपी या उसके सहयोगियों तक पहुंचाई और उसके बाद शिकायत वापस लेने के लिए धमकी, दबाव या उत्पीड़न किया गया, तो मामले के तथ्यों के आधार पर धमकी अथवा आपराधिक साजिश से जुड़े प्रावधान भी लागू हो सकते हैं।
यहां भी यह महत्वपूर्ण है कि केवल शिकायतकर्ता का विवरण किसी अधिकारी के माध्यम से सामने आने से स्वतः आपराधिक साजिश सिद्ध नहीं होती। अधिकारी की भूमिका, जानकारी साझा करने का उद्देश्य, संचार रिकॉर्ड और उसके बाद हुई घटनाओं की जांच आवश्यक होगी।
धमकी मिलने पर BNS की धाराएं हो सकती हैं लागू
यदि शिकायतकर्ता को शिकायत वापस लेने के लिए धमकाया जाता है, तो परिस्थितियों के अनुसार BNS की धारा 351 के तहत आपराधिक धमकी का मामला बन सकता है। वहीं, धमकी के साथ अन्य आपराधिक कृत्य किए जाने पर संबंधित अन्य धाराएं भी परिस्थितियों के अनुसार लग सकती हैं। यदि अधिकारी और आरोपी के बीच पहले से मिलीभगत या शिकायतकर्ता को नुकसान पहुंचाने की साझा योजना के पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं, तो BNS की धारा 61 के तहत आपराधिक षड्यंत्र के प्रावधान पर भी विचार किया जा सकता है। इस तरह क्रिमिनल कॉन्स्पिरेसी व धमकी (BNS धारा 61 व 351/352): शिकायतकर्ता की गोपनीय जानकारी आरोपी से साझा कर उसे प्रताड़ित कराने में यदि अधिकारी की संलिप्तता पाई जाती है, तो उसे आपराधिक साजिश का हिस्सा माना जाएगा।

पीड़ित नागरिक कैसे कराएं कार्रवाई?
यदि किसी शिकायतकर्ता को लगता है कि उसकी शिकायत का निस्तारण बिना जांच के कर दिया गया है या आख्या वास्तविक तथ्यों के विपरीत है, तो उसे केवल मौखिक आपत्ति दर्ज कराने के बजाय दस्तावेजी साक्ष्य तैयार करना चाहिए। विधिक सलाहकारों के अनुसार, यदि कोई अधिकारी फर्जी आख्या लगाता है या आपकी पहचान उजागर कर दबाव बनवाता है, तो पीड़ित ये कदम उठा सकते हैं:
1. निस्तारण पर असंतुष्ट प्रतिक्रिया दें:IGRS पर उपलब्ध फीडबैक/असंतुष्ट विकल्प के माध्यम से यह स्पष्ट करें कि समस्या का वास्तविक समाधान नहीं हुआ है और आख्या में कौन-कौन से तथ्य गलत हैं।
2. मूल शिकायत और आख्या सुरक्षित रखें:शिकायत संख्या, तारीख, पोर्टल पर अपलोड किए गए दस्तावेज, अधिकारी की आख्या और निस्तारण की स्थिति के स्क्रीनशॉट सुरक्षित रखें।
3. धमकी के साक्ष्य सुरक्षित रखें: धमकी भरे संदेश, व्हाट्सऐप चैट, कॉल डिटेल से संबंधित उपलब्ध रिकॉर्ड और अन्य साक्ष्यों को सुरक्षित रखें।
4. वरिष्ठ अधिकारियों को लिखित शिकायत दें: मामले की प्रकृति के अनुसार जिलाधिकारी, पुलिस आयुक्त/वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक या संबंधित विभाग के उच्चाधिकारी को लिखित शिकायत देकर निष्पक्ष जांच की मांग की जा सकती है।
5. गंभीर मामले में न्यायिक उपाय: यदि पुलिस द्वारा शिकायत पर कार्रवाई नहीं की जाती है, तो उपलब्ध कानूनी उपायों के तहत न्यायालय का रुख किया जा सकता है। BNSS की धारा 175(3) के अंतर्गत मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन एक महत्वपूर्ण न्यायिक उपाय है, लेकिन इसका प्रयोग मामले के तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उचित कानूनी सलाह के साथ किया जाना चाहिए।
सिर्फ 'निस्तारण' नहीं, निष्पक्ष जांच जरूरी
IGRS व्यवस्था का उद्देश्य केवल शिकायतों की संख्या कम करना या उन्हें पोर्टल पर निस्तारित दिखाना नहीं, बल्कि नागरिक की शिकायत का निष्पक्ष और तथ्यपरक समाधान सुनिश्चित करना है। इसलिए किसी अधिकारी द्वारा शिकायत पर की गई जांच, तैयार की गई आख्या और उसके आधार पर किए गए निस्तारण की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण है। यदि किसी मामले में जानबूझकर झूठी आख्या, आरोपी को अनुचित लाभ पहुंचाने की कोशिश या शिकायतकर्ता को धमकाने के लिए उसकी निजी जानकारी के दुरुपयोग के ठोस साक्ष्य सामने आते हैं, तो संबंधित अधिकारी की भूमिका की विभागीय जांच के साथ-साथ परिस्थितियों के अनुसार आपराधिक कानून के तहत भी जांच की जा सकती है।
नोट: जनतंत्र लाइव के सम्पादक द्वारा लिखी गई यह खबर जनमानस को जागरूक करने और सामान्य कानूनी जानकारी के उद्देश्य से है। किसी विशेष मामले में कौन-सी BNS/BNSS धारा लागू होगी, यह घटना के वास्तविक तथ्यों, उपलब्ध साक्ष्यों और जांच के आधार पर तय होता है।



टिप्पणियां