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दिल्ली: आगजनी में यमराज से लड़ गया कांस्टेबल अनिल महला, अब बज रहा जांबाजी का डंका

  • लेखक की तस्वीर: Jantantra Live
    Jantantra Live
  • 22 दिस॰ 2025
  • 3 मिनट पठन

मोहन गार्डन की बिल्डिंग में जान पर खेलकर कॉन्स्टेबल ने बुझाई सिलेंडर की आग, चार मंजिला इमारत में रहते थे 16 लोगों का परिवार



नई दिल्ली। तारीख 20 दिसंबर और समय रात के करीब 9:39 बजे। अचानक फोन की घंटी ने दी खतरे की दस्तक। दिल्ली के मोहन गार्डन थाना क्षेत्र की एक चार मंजिला इमारत से कंट्रोल रूम को एक डरावनी सूचना मिली। खबर थी कि इमारत के एक फ्लैट में गैस सिलेंडर में आग लग गई है और वह कभी भी फट सकता है। मकान के कई बिल्डिंग के दरवाजे अंदर से बंद थे। अचानक सभी घरों के दरवाजों पर जोर-जोर से आवाज आने लगी। पुलिस कमांड रूम ने तुरंत मोहन गार्डन के एसएचओ इंस्पेक्टर मुकेश अंतिल को सूचित किया। डिस्ट्रिक्ट कंट्रोल रूम से मैसेज फ्लैश होते ही एसएचओ ने तुरंत अपने बीट स्टाफ को डायल किया ताकि मौके पर तुरंत पहुंच सके।

बता दें कि राजधानी दिल्ली की तंग गलियों में तैनात पुलिसकर्मी अक्सर कानून व्यवस्था और अपराध रोकने के लिए जाने जाते हैं, लेकिन कभी-कभी उनकी वर्दी के पीछे एक ऐसा फरिश्ता छिपा होता है जो दूसरों की जान बचाने के लिए यमराज यानी मौत से भी टकरा जाता है। ऐसी ही एक रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना 20 दिसंबर 2025 की रात को मोहन गार्डन इलाके में घटी। दिल्ली पुलिस के एक जांबाज सिपाही ने अपनी जान की परवाह किए बिना वह कर दिखाया, जिसे सुनकर किसी का भी सीना गर्व से चौड़ा हो जाए।

16 परिवार और एक धधकता गोला: जिस इमारत में आग लगी थी, वह चार मंजिला थी और उसमें कुल 16 परिवार रहते थे। रात का समय होने के कारण अधिकांश लोग अपने घरों में थे। आग रसोई में रखे एक गैस सिलेंडर में लगी थी, जो तेजी से फैल रही थी। अगर सिलेंडर फटता, तो पूरी इमारत ताश के पत्तों की तरह ढह सकती थी और दर्जनों जिंदगियां पल भर में खाक हो सकती थीं। पीसीआर और फायर ब्रिगेड को पहुंचने में कुछ मिनट लगने वाले थे, लेकिन वहां मौजूद लोगों के लिए हर एक सेकंड सदियों के बराबर था।

कांस्टेबल अनिल महला की 'सुपरमैन': एंट्री घटनास्थल के सबसे करीब तैनात बीट कांस्टेबल अनिल महला जैसे ही मौके पर पहुंचे, उन्होंने देखा कि इमारत में भगदड़ मची हुई है। लोग अपनी जान बचाने के लिए चिल्ला रहे थे। आग की लपटें रसोई की खिड़की से बाहर झांक रही थीं। अनिल जानते थे कि फायर ब्रिगेड का इंतजार करने का मतलब है मौत को दावत देना। 16 परिवारों को इतनी जल्दी सुरक्षित बाहर निकालना मुमकिन नहीं था। ऐसे में अनिल ने वह फैसला लिया जो शायद कोई सामान्य व्यक्ति नहीं ले पाता।

नजारा था भयावह

अनिल बिना डरे उस धधकती हुई रसोई के अंदर घुस गए। वहां का नजारा भयावह था। सिलेंडर आग का गोला बन चुका था। अपनी जान की परवाह किए बिना, सिपाही अनिल ने नंगे हाथों से उस जलते हुए भारी सिलेंडर को पकड़कर बाहर की ओर खींचा। आग की तपिश उनके चेहरे और हाथों को झुलसा रही थी, लेकिन उनके दिमाग में सिर्फ उन 16 परिवारों का चेहरा घूम रहा था।

मौत को मात देकर जीवन किया सुरक्षित: मौत को मात और सुरक्षित जीवन अनिल ने साहस दिखाते हुए उस जलते हुए सिलेंडर को घर से बाहर निकाला और खुले स्थान पर ले जाकर आग को बुझाया। सिलेंडर के रेगुलेटर और नोजल से निकलती लपटों को नियंत्रित करना एक आत्मघाती कदम था, लेकिन अनिल की फुर्ती और बहादुरी ने एक बड़े विस्फोट को टाल दिया। कुछ ही देर में एसएचओ मुकेश अंतिल और दमकल विभाग की टीम भी मौके पर पहुंच गई, लेकिन तब तक अनिल सारा जोखिम उठाकर आग पर काबू पा चुके थे।

दिल्ली पुलिस का सीना किया चौड़ा: वर्दी का सम्मान और अधिकारियों की शाबाशी द्वारका जिले के डीसीपी अंकित सिंह ने कांस्टेबल अनिल महला के इस साहस की जमकर सराहना की है। उन्होंने कहा, ''अनिल ने जो किया वह किसी चमत्कार से कम नहीं है। अपनी सुरक्षा को नजरअंदाज कर दूसरों के कल्याण के लिए ऐसा साहसी कदम उठाना दिल्ली पुलिस के उस जज्बे का प्रतीक है जिसे हम हर जवान में देखना चाहते हैं।'' इमारत के निवासियों ने जब देखा कि कैसे एक जवान ने अपनी जान जोखिम में डालकर उनकी जान बचाई, तो उनकी आंखों में आंसू आ गए। लोगों के लिए अनिल अब सिर्फ एक पुलिसकर्मी नहीं, बल्कि एक 'सुपरहीरो'बन चुके हैं। यह घटना याद दिलाती है कि समाज की सुरक्षा के लिए वर्दीधारी जवान किस हद तक जा सकते हैं। कांस्टेबल अनिल की इस वीरता के लिए उन्हें सम्मानित करने की सिफारिश भी की गई है।

 
 
 

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