16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन किया जाए: आईपीए
- Jantantra Live

- 12 दिस॰ 2025
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गाजियाबाद। इंडियन पेरेंट्स एसोसिएशन (आईपीए ) ने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों द्वारा सोशल मीडिया उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की माँग को लेकर भारत के माननीय प्रधानमंत्री, केंद्रीय शिक्षा मंत्री, तथा संचार, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को विस्तृत ज्ञापन भेजा है आईपीए की राष्ट्रीय अध्यक्ष सीमा त्यागी ने कहा है कि देश के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक है कि टीनएजर्स को सोशल मीडिया की लत और उससे जुड़े खतरों से बचाया जाए, क्योंकि यह समस्या अब राष्ट्रीय स्तर का गंभीर मुद्दा बन चुकी है।
“अंडर-16 बच्चों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से दूर रखना अब बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, उनकी सुरक्षा और पढ़ाई— सबके लिए अनिवार्य हो गया है। हम सभी माता-पिता से अपील करते हैं कि यदि आपके बच्चे किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सक्रिय हैं, तो तत्काल उन्हें लॉग-आउट करवाएं।” सभी माता पिता चिंतित हैं कि बच्चों के लिए सोशल मीडिया आज मानसिक सुरक्षा, प्राइवेसी उल्लंघन, साइबर बुलिंग, गेमिंग एडिक्शन, असभ्य कंटेंट और अन्य साइबर खतरों का बड़ा स्रोत बन चुका है। कई अंतरराष्ट्रीय शोध बताते हैं कि कम उम्र में सोशल मीडिया का उपयोग बच्चों की एकाग्रता, पढ़ाई, सामाजिक व्यवहार और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डालता है। मीडिया की खबरों के अनुसार “ऑस्ट्रेलिया दुनिया का पहला देश बन गया है जिसने अंडर-16 बच्चों को फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, एक्स, स्नैपचैट और टिकटॉक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से प्रतिबंधित कर दिया है। अब जब भारत विश्वगुरु बनने की राह पर तेजी से आगे बढ़ रहा है, तो हमें भी अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए उसी स्तर का साहसिक कदम उठाना होगा।” देश के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए आवश्यक है कि हम अपने बच्चों को स्क्रीन और वर्चुअल दुनिया की गिरफ्त से निकालकर वास्तविक दुनिया की ओर वापस ले जाएँ। अब समय है कि भारत भी अंडर-16 बच्चों को सोशल मीडिया से पूर्णत: लॉग-आउट कराए और उनके खोए हुए बचपन को पुनः लौटाए।
इंडियन पेरेंट्स एसोसिएशन ने भारत सरकार से मांग की है कि देश में एक सुरक्षित इंटरनेट नीति लागू की जाए, जिसमें सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए अनिवार्य आयु-पुष्टि (ऐज वेरिफिकेशन) लागू करना शामिल हो, ताकि बच्चों को डिजिटल खतरों से प्रभावी रूप से बचाया जा सके।



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