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सहमति से बने यौन संबंध को अपराध नहीं करार दिया जा सकताः हाईकोर्ट

  • लेखक की तस्वीर: Jantantra Live
    Jantantra Live
  • 2 दिन पहले
  • 2 मिनट पठन

झूठे विवाह-प्रलोभन के आरोपों में हाईकोर्ट ने चार्जशीट सहित पूरी आपराधिक कार्यवाही की रद्द


प्रयागराज: सहमति से विवाह संबंध बनाने के वादे और उसके कारण बने यौन संबंध को विवाह का झूठा वादा कर बनाया गया यौन संबंध नहीं करार दिया जा सकता है. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए झूठे विवाह-प्रलोभन के आधार पर यौन संबंध बनाने के आरोपों में आरोपियों के खिलाफ दाखिल चार्जशीट, संज्ञान आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है. अलीगढ़ के जितेंद्र पाल और दो अन्य की याचिका पर न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना ने सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया.

मामले के अनुसार, याचियों के खिलाफ थाना गांधी पार्क में युवती ने मुकदमा दर्ज कराया था. आरोप था कि याची ने विवाह का झूठा वादा कर यौन संबंध बनाए. उसके भाई और भाभी पर धमकी देने का आरोप लगाया गया था. पुलिस ने इस मामले में भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 और 351(2) के तहत चार्जशीट दाखिल की थी. दर्ज़ प्राथमिकी के अनुसार, पीड़िता और याची वर्ष 2015-16 से एक-दूसरे को जानते थे और कॉलेज के समय से उनके बीच प्रेम संबंध थे. 2021 से दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने, जो नवंबर 2024 तक चले. पीड़िता का आरोप था कि यह संबंध विवाह के झूठे वादे के आधार पर बनाए गए और बाद में इनकार कर दिया गया.

हालांकि, जांच के दौरान जबरन गर्भपात से संबंधित आरोपों की पुष्टि नहीं हो सकी, जिसके चलते उस धारा में चार्जशीट दाखिल नहीं की गई. कोर्ट ने कहा कि दोनों पक्ष वयस्क और शिक्षित थे. दोनों का रिश्ता लंबे समय तक चला. प्रारंभ से ही प्रेम संबंध थे और विवाह का आश्वासन सही नीयत से किया गया प्रतीत होता है. ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि शुरू से ही विवाह का वादा धोखाधड़ी से किया गया था.

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि लंबे समय तक सहमति से बने शारीरिक संबंधों को केवल बाद में विवाह न होने के आधार पर आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने यह भी कहा कि याची के भाई और भाभी के खिलाफ आपराधिक धमकी के आरोपों को समर्थन देने के लिए कोई स्वतंत्र और ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं है. इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने 30 मार्च 2025 की चार्जशीट और 22 मई 2025 का संज्ञान आदेश तथा मुकदमे की समस्त कार्यवाही को रद्द कर दिया है.

 
 
 

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