भारत में पहली बार लगेगी महाराज यदु की प्रतिमा
- Jantantra Live

- 16 जन॰
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यूपी विधानसभा चुनाव से पहले ओबीसी मतदाताओं को रिझाने का दांव

गोरखपुर: यूपी विधानसभा चुनाव से पहले ओबीसी को रिझाने का दांव खेला जा रहा है. उत्तर प्रदेश की कुल आबादी में ओबीसी की हिस्सेदारी 50 फीसदी से ज्यादा मानी जाती है. ओबीसी उत्तर प्रदेश में का सबसे बड़ा वोट बैंक है, जिसे मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जाता है: पिछड़ा वर्ग जिसमें यादव और कुर्मी आते हैं और अति पिछड़ा वर्ग जिसमें सैनी, मौर्य, निषाद, राजभर आदि शामिल हैं. आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए भी सभी दल की नज़र इस वोट बैंक पर है. शहरी क्षेत्रों में भी ओबीसी की आबादी करीब 40 फीसदी है.
फरवरी में होगा प्रतिमा का शिलान्यास: भारत में पहली बार महाराज यदु की प्रतिमा गोरखपुर में स्थापित की जाएगी. इसकी आधिकारिक घोषणा श्री कृष्ण धाम ट्रस्ट के अध्यक्ष और श्री यदुधाम पीठ के संस्थापक काली शंकर यादव ने गुरुवार को की. उन्होंने बताया कि गोरखपुर की ऐतिहासिक धरती चौरी चौरा में 'महाराजा यदु' की विश्व की पहिला स्थापित होने जा रही. फरवरी माह के पहले सप्ताह में इसका शिलान्यास किया जाएगा.

पीठ की स्थापना 5 एकड़ भूमि पर होगी: काली शंकर यादव ने कहा कि चौरी-चौरा के ब्रह्मपुर में 'श्री यदु धाम पीठ' नाम से भारतवर्ष में यदुवंश का पहला प्रेरणा एवं शक्ति केंद्र स्थापित होने जा रहा है. यहां श्री राधा-कृष्ण और सहस्त्रबाहु अर्जुन (कार्तवीर्य अर्जुन) की भी भव्य एवं दिव्य प्रतिमाओं की स्थापना होगी. जो यदु वंश की वीरता और धर्मरक्षण की परंपरा का प्रतीक मानी जाती है. पीठ 5 एकड़ भूमि पर स्थापित की जाएगी.
अध्ययन और साधना का केंद्र बनेगी पीठ: श्री यदुधाम पीठ के संस्थापक काली शंकर यादव ने बताया कि यह पीठ केवल यादव समाज ही नहीं, बल्कि जायसवाल (हैहयवंशी) समाज की साझा वैदिक ऐतिहासिक विरासत का संगम होगा. यह स्थल यदुवंशी, हैहयवंशी और संबंधित वंशों के लिए अध्ययन, साधना, प्रेरणा और संगठन का एक जीवंत केंद्र बनेगा.
पीठ का कोई पीठाधीश्वर नहीं होगा: काली शंकर ने कहा कि इस पीठ का कोई पीठाधीश्वर नहीं होगा. यह संचालक मंडल के जरिए संचालित होगा. यह पीठ उन राजनीतिक दलों और नेताओं पर भी तीखा प्रहार है जिन्होंने दशकों तक यादवों और पिछड़े वर्गों के नाम पर सत्ता का सुख भोगा, लेकिन समाज के आदि पूर्वजों को राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर सम्मान दिलाने की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की.
नेतृत्व तय करने वाला समाज बनेगा पिछड़ा वर्ग: यदुधाम पीठ के संस्थापक ने कहा कि अब समाज केवल किसी का "वोट बैंक" बनकर नहीं रहेगा, बल्कि अपना वैचारिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक नेतृत्व स्वयं तय करने वाला स्वाभिमानी समाज बनकर उभरेगा. यदुवंशी होना किसी दल का अनुयायी होना नहीं, बल्कि समता, साहस और सत्य का प्रतिनिधि होना है. यदुवंश किसी पार्टी की जायदाद नहीं है. यह एक जीवंत परंपरा है. राजनीतिक विचारधाराएं अस्थायी होती हैं, लेकिन यदुवंश की सामाजिक चेतना शाश्वत है.
महाराज यदु के चार पुत्र थे: काली शंकर ने बताया कि किसी एक पार्टी या विचारधारा से जुड़ना व्यक्ति का अधिकार है, लेकिन पूरे वंश को उसी तराजू में तौलना सामाजिक अन्याय है. महाराज यदु के चार पुत्र थे. पहले पुत्र सहस्त्र जीते थे, दूसरे पुत्र का नाम क्रोष्ठा और तीसरे रिपु और चौथे नल थे. पहले पुत्र से हैहयवंश का उदय हुआ, जिसमें सहस्त्रबाहु कीर्तिवीर अर्जुन का जन्म हुआ. जो जायसवाल समाज के कुल देवता और उनके पूर्वज हैं.

महाराज यदु सम्मान के पात्र थे: यदुधाम पीठ के संस्थापक ने बताया कि दूसरे पुत्र से भगवान कृष्ण का जन्म होता है, जो यादव समाज के पूर्वज हैं. इन दोनों वंश के आदि पूर्वज महाराज यदु हैं जिनकी प्रतिमा स्थापित होने जा रही है. जिस यदुकुल में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार लिया, उस वंश के संस्थापक और आदि पुरुष महाराज यदु को इतिहास के पन्नों में वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे वास्तविक रूप से पात्र थे.
11 फीट ऊंची स्वर्णमयी महाराज यदु की प्रतिमा लगेगी: काली शंकर ने कहा कि वर्तमान समय में पूरे विश्व में महाराज यदु की न तो कोई प्रतिमा है और न ही यदुवंशियों की अपनी कोई स्वतंत्र पीठ स्थापित है. इसी ऐतिहासिक उपेक्षा और अन्याय को समाप्त करने के लिए चौरी-चौरा के ब्रह्मपुर में विश्व की पहली 11 फीट ऊंची स्वर्णमयी महाराज यदु की प्रतिमा स्थापित की जाएगी.
यह "श्री यदुधाम पीठ" विश्व के करोड़ों यदुवंशियों के लिए अपनी तरह का पहला और एकमात्र आध्यात्मिक और सांस्कृतिक शक्ति केंद्र होगा. आगामी चरण में श्री कृष्ण धर्म ट्रस्ट द्वारा भूमि पूजन, शिलान्यास, निर्माण योजना भी सबके सामने होगी.
बीजेपी और सपा का OBC वोट शेयर बढ़ा: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 के परिणामों में OBC समुदायों के मतदान का पैटर्न प्रमुख रूप से दो बड़े प्रतिद्वंद्वी दलों, बीजेपी और समाजवादी पार्टी (सपा) के बीच विभाजित रहा. बीजेपी ने ओबीसी वोटों का सबसे बड़ा हिस्सा प्राप्त किया. CSDS के आंकड़ों के अनुसार, लगभग 65% गैर-यादव ओबीसी मतदाताओं ने भाजपा को वोट दिया. यह 2017 के पिछले चुनाव (58%) की तुलना में वृद्धि दर्शाता है.
सपा का वोट शेयर बढ़कर 32% से अधिक हो गया: सपा ने ओबीसी के भीतर यादव समुदाय का लगभग एकतरफा समर्थन हासिल किया. साथ ही, सपा ने इस बार गैर-यादव ओबीसी के बीच भी अपनी पकड़ मजबूत की, जिससे उसका कुल वोट शेयर बढ़कर 32% से अधिक हो गया, हालांकि वह भाजपा के बड़े वोट बैंक को तोड़ने में पूरी तरह सफल नहीं रही.
BSP और कांग्रेस के OBC वोट बैंक में गिरावट: बसपा के ओबीसी वोट बैंक में भारी गिरावट आई. 2022 में बसपा का कुल वोट शेयर गिरकर लगभग 12.9% रह गया, जिसका मुख्य कारण ओबीसी और गैर-जाटव दलित वोटों का भाजपा और सपा की ओर खिसकना था. कांग्रेस का प्रदर्शन सबसे कमजोर रहा और उसका कुल वोट शेयर घटकर मात्र 2.4% के आसपास रह गया, जिसमें ओबीसी समुदायों की हिस्सेदारी नगण्य थी.



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